ताजमहल का मालिक कौन है? उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बीच क्या विवाद है?
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इरफान बेदार के आवेदन के बाद वक्फ बोर्ड ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नोटिस जारी किया, जो वर्षों से ताजमहल का प्रबंधन कर रहा है। इससे ताजमहल के स्वामित्व के संबंध में निर्णय के बजाय कानूनी लड़ाई शुरू हो गई।
पिछले कुछ दिनों से देश भर में वक्फ संशोधन विधेयक पर गरमागरम बहस चल रही है। यह विधेयक कल लोकसभा में पारित हो गया और आज राज्यसभा में इसके अनुमोदन के लिए मतदान होगा। इस बीच, इससे वक्फ से जुड़े कई मुद्दे और चिंताएं सामने आ रही हैं। इसमें भारत का सबसे प्रसिद्ध स्मारक ताजमहल भी शामिल है।
इस बीच, ताजमहल के स्वामित्व को लेकर कई वर्षों से कानूनी और राजनीतिक विवाद चल रहा है। 17वीं सदी का ताजमहल इस विवाद के केंद्र में है कि यह उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड का है या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का। यह मामला दशकों से चल रहा है, जिसमें अदालती लड़ाइयां, राजनीतिक विवाद और धार्मिक दावे भी शामिल हैं। लेकिन यह मुद्दा अभी तक हल नहीं हुआ है।
यह विवाद 1998 में शुरू हुआ।
ताजमहल के स्वामित्व को लेकर विवाद पहली बार 1998 में शुरू हुआ था। उस समय फिरोजाबाद के एक व्यापारी इरफान बेदार ने ताजमहल को वक्फ संपत्ति घोषित करने के लिए उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड में आवेदन किया था। उस समय उन्होंने यह भी अनुरोध किया था कि ऐतिहासिक ताजमहल के रखरखाव की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी जाए।
इरफान बेदार के आवेदन के बाद वक्फ बोर्ड ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नोटिस जारी किया, जो वर्षों से ताजमहल का प्रबंधन कर रहा है। इससे ताजमहल के स्वामित्व के संबंध में निर्णय के बजाय कानूनी लड़ाई शुरू हो गई।
सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई
बाद में, 2004 में इरफान बेदार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुकदमा दायर कर ताजमहल के रखरखाव की जिम्मेदारी मांगी। इसके बाद कोर्ट ने वक्फ बोर्ड को इस मामले को गंभीरता से लेने का निर्देश दिया। इसलिए, वक्फ बोर्ड ने 2005 में ताजमहल को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कर दिया। हालांकि, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।
रिपोर्टों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और वक्फ बोर्ड को निर्देश दिया कि वह दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करे कि मुगल सम्राट शाहजहां ने ताजमहल को आधिकारिक रूप से वक्फ संपत्ति घोषित किया था। बाद में 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने बोर्ड के निर्णय पर रोक लगा दी तथा आगे की जांच के निर्देश जारी किये।
राजनीतिक मोड़
2014 में ताजमहल के स्वामित्व के मुद्दे ने राजनीतिक मोड़ ले लिया। उस समय समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने तर्क दिया था कि ताजमहल में शाहजहां और मुमताज की कब्रें हैं, इसलिए इसे वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार
अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, उस समय अदालत ने बोर्ड से ताजमहल को वक्फ संपत्ति घोषित करने वाले शाहजहां द्वारा हस्ताक्षरित मूल दस्तावेज पेश करने को कहा था।
सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने एक गंभीर सवाल उठाया। उन्होंने कहा था, “भारत में कौन स्वीकार करेगा कि ताजमहल वक्फ बोर्ड का है?” उन्होंने आगे कहा, “ताजमहल 250 साल से ज़्यादा समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में रहा। उसके बाद यह केंद्र सरकार के नियंत्रण में आ गया। इसलिए एएसआई ने इसके प्रबंधन की ज़िम्मेदारी ली है और ताजमहल का प्रबंधन करना उनका अधिकार है।”
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